Dus Classics
दस क्लासिक्स में उन प्रसंगों का विस्तार से वर्णन किया गया है जो दस महान हिंदी फ़िल्मों को बनाने के दौरान सामने आए। इस पुस्तक में उल्लेखित फ़िल्मों को भारतीय सिनेमा के इतिहास में मील का पत्थर माना जाता है। आश्चर्य में डालने वाले पेचीदा तथ्यों, फ़िल्में बनाने के पीछे निर्माताओं की प्रेरणा, अवधारणा तथा वास्तविक फ़िल्मांकन से संबंधित घटनाओं, आयोजनों तथा छोटे-छोटे प्रसंगों को इन फ़िल्मों में वास्तव में शामिल रहे अथवा किसी प्रकार से जुड़े रहे लोगों की स्मृति के आधार पर बताया गया है। कड़ी मेहनत से किए गए शोध, अनापेक्षित बाधाएँ तथा अल्पज्ञात तथ्यों का बारीकी से पेश किया गया ब्योरा न केवल पढ़ने के लिहाज से आकर्षक हैं, बल्कि उन कारणों पर भी प्रकाश डालते हैं जिन्होंने अंततः आज इन दस फ़िल्मों को क्लासिक बना दिया है। कई दिलचस्प तथ्य जैसे: मुग़ल-ए-आज़म को पूरा होने में 16 साल का समय क्यों लगा और वह रहस्यमय फ़ाइनेंसर कौन था जिसने अपने विश्वास और पैसे का इसमें निवेश किया, भले ही देरी के कारण फ़िल्म का बजट आसमान छू रहा था; अमिताभ बच्चन को आनंद में भास्कर बैनर्जी की भूमिका कैसे मिली, जबकि उन्हें एक अभिनेता के रूप में स्थापित करने वाली जंजीर तब तक रिलीज़ ही नहीं हुई थी... ऐसे ही कई जिज्ञासापरक सवालों के जवाब इस पुस्तक में दिए गए हैं। इसमें शामिल अधिकतर फ़िल्में 1950 से 1970 के बीच की हैं। हालांकि कई अन्य हिंदी फ़िल्मों में भी क्लासिक कहलाने की पात्रता है, पर लेखिका ने दस दिग्गज निर्देशकों द्वारा बनाई गई एक-एक श्रेष्ठ फ़िल्म का चयन किया है।
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दस क्लासिक्स में उन प्रसंगों का विस्तार से वर्णन किया गया है जो दस महान हिंदी फ़िल्मों को बनाने के दौरान सामने आए। इस पुस्तक में उल्लेखित फ़िल्मों को भारतीय सिनेमा के इतिहास में मील का पत्थर माना जाता है। आश्चर्य में डालने वाले पेचीदा तथ्यों, फ़िल्में बनाने के पीछे निर्माताओं की प्रेरणा, अवधारणा तथा वास्तविक फ़िल्मांकन से संबंधित घटनाओं, आयोजनों तथा छोटे-छोटे प्रसंगों को इन फ़िल्मों में वास्तव में शामिल रहे अथवा किसी प्रकार से जुड़े रहे लोगों की स्मृति के आधार पर बताया गया है। कड़ी मेहनत से किए गए शोध, अनापेक्षित बाधाएँ तथा अल्पज्ञात तथ्यों का बारीकी से पेश किया गया ब्योरा न केवल पढ़ने के लिहाज से आकर्षक हैं, बल्कि उन कारणों पर भी प्रकाश डालते हैं जिन्होंने अंततः आज इन दस फ़िल्मों को क्लासिक बना दिया है। कई दिलचस्प तथ्य जैसे: मुग़ल-ए-आज़म को पूरा होने में 16 साल का समय क्यों लगा और वह रहस्यमय फ़ाइनेंसर कौन था जिसने अपने विश्वास और पैसे का इसमें निवेश किया, भले ही देरी के कारण फ़िल्म का बजट आसमान छू रहा था; अमिताभ बच्चन को आनंद में भास्कर बैनर्जी की भूमिका कैसे मिली, जबकि उन्हें एक अभिनेता के रूप में स्थापित करने वाली जंजीर तब तक रिलीज़ ही नहीं हुई थी... ऐसे ही कई जिज्ञासापरक सवालों के जवाब इस पुस्तक में दिए गए हैं। इसमें शामिल अधिकतर फ़िल्में 1950 से 1970 के बीच की हैं। हालांकि कई अन्य हिंदी फ़िल्मों में भी क्लासिक कहलाने की पात्रता है, पर लेखिका ने दस दिग्गज निर्देशकों द्वारा बनाई गई एक-एक श्रेष्ठ फ़िल्म का चयन किया है।
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दस क्लासिक्स में उन प्रसंगों का विस्तार से वर्णन किया गया है जो दस महान हिंदी फ़िल्मों को बनाने के दौरान सामने आए। इस पुस्तक में उल्लेखित फ़िल्मों को भारतीय सिनेमा के इतिहास में मील का पत्थर माना जाता है। आश्चर्य में डालने वाले पेचीदा तथ्यों, फ़िल्में बनाने के पीछे निर्माताओं की प्रेरणा, अवधारणा तथा वास्तविक फ़िल्मांकन से संबंधित घटनाओं, आयोजनों तथा छोटे-छोटे प्रसंगों को इन फ़िल्मों में वास्तव में शामिल रहे अथवा किसी प्रकार से जुड़े रहे लोगों की स्मृति के आधार पर बताया गया है। कड़ी मेहनत से किए गए शोध, अनापेक्षित बाधाएँ तथा अल्पज्ञात तथ्यों का बारीकी से पेश किया गया ब्योरा न केवल पढ़ने के लिहाज से आकर्षक हैं, बल्कि उन कारणों पर भी प्रकाश डालते हैं जिन्होंने अंततः आज इन दस फ़िल्मों को क्लासिक बना दिया है। कई दिलचस्प तथ्य जैसे: मुग़ल-ए-आज़म को पूरा होने में 16 साल का समय क्यों लगा और वह रहस्यमय फ़ाइनेंसर कौन था जिसने अपने विश्वास और पैसे का इसमें निवेश किया, भले ही देरी के कारण फ़िल्म का बजट आसमान छू रहा था; अमिताभ बच्चन को आनंद में भास्कर बैनर्जी की भूमिका कैसे मिली, जबकि उन्हें एक अभिनेता के रूप में स्थापित करने वाली जंजीर तब तक रिलीज़ ही नहीं हुई थी... ऐसे ही कई जिज्ञासापरक सवालों के जवाब इस पुस्तक में दिए गए हैं। इसमें शामिल अधिकतर फ़िल्में 1950 से 1970 के बीच की हैं। हालांकि कई अन्य हिंदी फ़िल्मों में भी क्लासिक कहलाने की पात्रता है, पर लेखिका ने दस दिग्गज निर्देशकों द्वारा बनाई गई एक-एक श्रेष्ठ फ़िल्म का चयन किया है।















