Dukh: Ek Nai Roshni
यह पुस्तक व्यक्ति के अन्तर्मन की शक्ति को जागृत ही नहीं करती बल्कि प्रकृति, ईश्वर तथा अध्यात्म से जोड़ते हुए कर्म प्रधानता पर बल देती है। यह मानव जीवन की अद्भुत व्याख्या करती है, इसे सभी के लिए सुपाठ्य बनाया गया है और साथ ही इसे बड़ी सहजतापूर्वक लिखा गया है। यह किसी भी उम्र के व्यक्ति के लिए उतनी ही उपयोगी है। इस पुस्तक की रचना 8 खण्डों तथा 126 अध्यायों में की गई है। इस लेखन में हमारे देश के दर्शन का तथा जो महान व्यक्तित्व हुए हैं उनके कथन का प्रयोग किया गया है। इसमें भारतीय सभ्यता तथा संस्कृति का मूलभाव भी सन्निहित है। दुखः एक नई रोशनी पुस्तक दुख को केन्द्र में रख कर रची गई है। दुख से व्यक्ति अवसाद में चला जाता है, रोगी बन जाता है और यह असमय मृत्यु का कारण भी है। जीवन की विपरीत परिस्थितियों और बुरे वक्त में भाग्यहीनता की जगह कर्मप्रधानता पर बल दिया गया है। इसमें व्यक्ति को अपने मन-मस्तिष्क की शक्ति का प्रयोग करते हुए बस कर्मठता, जुनून, हार न मानने की अभिवृत्ति पर बल दिया गया है। कुदरत ने प्रत्येक व्यक्ति की सृष्टि किसी खास उद्देश्य से की है, अतः यह पुस्तक सकारात्मक विचार के मार्गदर्शन में चलते रहने पर बल देती है। यदि व्यक्ति को यह अनुभूति हो कि वह दुख में है तो सुख भी वहीं होगा। दुख के बिना नई रोशनी हो ही नहीं सकती। एक दिन प्रकृति ही आपको न्याय देगी। दुख जीवन और मृत्यु की तरह सत्य है। इस मानव समाज में यह एक ऐसा पहलू है, जिसने प्रत्येक को कहीं न कहीं बहुत पीड़ित किया है। परंतु इस विषय पर असहनीय पीड़ा में भी मौनता विद्यमान है। यह लेखन व्यवहारिक है अर्थात व्यवहार - विज्ञान पर आधारित है। इस लेखन में लगभग 21 वर्षों का अध्ययन, व्यवहार-विज्ञान, प्रत्यक्ष साक्षात्कार तथा चिंतन-मंथन शामिल है।
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यह पुस्तक व्यक्ति के अन्तर्मन की शक्ति को जागृत ही नहीं करती बल्कि प्रकृति, ईश्वर तथा अध्यात्म से जोड़ते हुए कर्म प्रधानता पर बल देती है। यह मानव जीवन की अद्भुत व्याख्या करती है, इसे सभी के लिए सुपाठ्य बनाया गया है और साथ ही इसे बड़ी सहजतापूर्वक लिखा गया है। यह किसी भी उम्र के व्यक्ति के लिए उतनी ही उपयोगी है। इस पुस्तक की रचना 8 खण्डों तथा 126 अध्यायों में की गई है। इस लेखन में हमारे देश के दर्शन का तथा जो महान व्यक्तित्व हुए हैं उनके कथन का प्रयोग किया गया है। इसमें भारतीय सभ्यता तथा संस्कृति का मूलभाव भी सन्निहित है। दुखः एक नई रोशनी पुस्तक दुख को केन्द्र में रख कर रची गई है। दुख से व्यक्ति अवसाद में चला जाता है, रोगी बन जाता है और यह असमय मृत्यु का कारण भी है। जीवन की विपरीत परिस्थितियों और बुरे वक्त में भाग्यहीनता की जगह कर्मप्रधानता पर बल दिया गया है। इसमें व्यक्ति को अपने मन-मस्तिष्क की शक्ति का प्रयोग करते हुए बस कर्मठता, जुनून, हार न मानने की अभिवृत्ति पर बल दिया गया है। कुदरत ने प्रत्येक व्यक्ति की सृष्टि किसी खास उद्देश्य से की है, अतः यह पुस्तक सकारात्मक विचार के मार्गदर्शन में चलते रहने पर बल देती है। यदि व्यक्ति को यह अनुभूति हो कि वह दुख में है तो सुख भी वहीं होगा। दुख के बिना नई रोशनी हो ही नहीं सकती। एक दिन प्रकृति ही आपको न्याय देगी। दुख जीवन और मृत्यु की तरह सत्य है। इस मानव समाज में यह एक ऐसा पहलू है, जिसने प्रत्येक को कहीं न कहीं बहुत पीड़ित किया है। परंतु इस विषय पर असहनीय पीड़ा में भी मौनता विद्यमान है। यह लेखन व्यवहारिक है अर्थात व्यवहार - विज्ञान पर आधारित है। इस लेखन में लगभग 21 वर्षों का अध्ययन, व्यवहार-विज्ञान, प्रत्यक्ष साक्षात्कार तथा चिंतन-मंथन शामिल है।
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यह पुस्तक व्यक्ति के अन्तर्मन की शक्ति को जागृत ही नहीं करती बल्कि प्रकृति, ईश्वर तथा अध्यात्म से जोड़ते हुए कर्म प्रधानता पर बल देती है। यह मानव जीवन की अद्भुत व्याख्या करती है, इसे सभी के लिए सुपाठ्य बनाया गया है और साथ ही इसे बड़ी सहजतापूर्वक लिखा गया है। यह किसी भी उम्र के व्यक्ति के लिए उतनी ही उपयोगी है। इस पुस्तक की रचना 8 खण्डों तथा 126 अध्यायों में की गई है। इस लेखन में हमारे देश के दर्शन का तथा जो महान व्यक्तित्व हुए हैं उनके कथन का प्रयोग किया गया है। इसमें भारतीय सभ्यता तथा संस्कृति का मूलभाव भी सन्निहित है। दुखः एक नई रोशनी पुस्तक दुख को केन्द्र में रख कर रची गई है। दुख से व्यक्ति अवसाद में चला जाता है, रोगी बन जाता है और यह असमय मृत्यु का कारण भी है। जीवन की विपरीत परिस्थितियों और बुरे वक्त में भाग्यहीनता की जगह कर्मप्रधानता पर बल दिया गया है। इसमें व्यक्ति को अपने मन-मस्तिष्क की शक्ति का प्रयोग करते हुए बस कर्मठता, जुनून, हार न मानने की अभिवृत्ति पर बल दिया गया है। कुदरत ने प्रत्येक व्यक्ति की सृष्टि किसी खास उद्देश्य से की है, अतः यह पुस्तक सकारात्मक विचार के मार्गदर्शन में चलते रहने पर बल देती है। यदि व्यक्ति को यह अनुभूति हो कि वह दुख में है तो सुख भी वहीं होगा। दुख के बिना नई रोशनी हो ही नहीं सकती। एक दिन प्रकृति ही आपको न्याय देगी। दुख जीवन और मृत्यु की तरह सत्य है। इस मानव समाज में यह एक ऐसा पहलू है, जिसने प्रत्येक को कहीं न कहीं बहुत पीड़ित किया है। परंतु इस विषय पर असहनीय पीड़ा में भी मौनता विद्यमान है। यह लेखन व्यवहारिक है अर्थात व्यवहार - विज्ञान पर आधारित है। इस लेखन में लगभग 21 वर्षों का अध्ययन, व्यवहार-विज्ञान, प्रत्यक्ष साक्षात्कार तथा चिंतन-मंथन शामिल है।











