Subah Salamat
मैं देने के गौरव से मुस्कुराती रही हकीकत में जिसने दिया, लिया... वो मेरे घमंड पे ठहाके लगाता रहा वो कहता, आओ, बैठो रात कटती नहीं मन होता कहूँ... कभी दिन भी गुज़ार के देखो मेरे बगैर घर की खातिर घर छोड़ के निकले हैं दीवाने वो संवारती रही घर उसके इंतज़ार में... उसने सराय को घर बना लिया
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मैं देने के गौरव से मुस्कुराती रही हकीकत में जिसने दिया, लिया... वो मेरे घमंड पे ठहाके लगाता रहा वो कहता, आओ, बैठो रात कटती नहीं मन होता कहूँ... कभी दिन भी गुज़ार के देखो मेरे बगैर घर की खातिर घर छोड़ के निकले हैं दीवाने वो संवारती रही घर उसके इंतज़ार में... उसने सराय को घर बना लिया
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मैं देने के गौरव से मुस्कुराती रही हकीकत में जिसने दिया, लिया... वो मेरे घमंड पे ठहाके लगाता रहा वो कहता, आओ, बैठो रात कटती नहीं मन होता कहूँ... कभी दिन भी गुज़ार के देखो मेरे बगैर घर की खातिर घर छोड़ के निकले हैं दीवाने वो संवारती रही घर उसके इंतज़ार में... उसने सराय को घर बना लिया











